शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

चीन की तरह बने

दिल्ली। आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञों तथा चीन मामलों के जानकारों का कहना है कि चीनी व्यवसायी अपने हितों को साधने में बहुत चौकन्ने तथा स्वार्थी प्रवृत्ति के होते हैं, इसलिए भारतीय कारपोरेट घरानों तथा युवा पेशेवरों को चीनी नागरिकों के साथ करार करते समय उन्हीं की शैली में काम करने की जरूरत है। उनका कहना है कि चीन दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने की तरफ अग्रसर है और इसकी बुनियाद में उसके नागरिकों की लगन, मेहनत और अपने हितों को साधने की प्रवृत्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है। चीन का व्यवसायी अपने माल को विश्व के हर बाजार में बेचने के लिए तैयार रहता है। जहां उसके व्यवसायी पहुंचते हैं वहां उनका सामान बाजार में छा जाता है।
उन्होंने कहा कि चीन की सरकार भी घरेलू उद्योगों को निर्यात करने के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान करती है। विशेषज्ञों ने यह विचार यहां जेके बिजनेस स्कूल के कार्यपालकों को चीन के साथ बिजनेस प्रोत्साहन विषय पर आयोजित दो दिवसीय के कार्यक्रम में व्यक्त किए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और भारत तेजी से बढती आर्थिक शक्तियां हैं और दोनों देश एक दूसरे के बिना इस दिशा में तरक्की नहीं कर सकते। जेके बिजनेस स्कूल की महानिदेशक डॉ. रीना रामचंद्रन का कहना है कि चीन और भारत वैश्विक आर्थिक मंच पर उभर रही महाशक्तियां हैं और दुनिया में किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का रास्ता अब इन दोनों देशों को साथ लिए बिना नहीं खुलता है। भारत के पास युवा शक्ति और ज्ञान का भंडार है जिसका इस्तेमाल चीन को अपने विकास के लिए जरूर करना चाहेगा। ऎसे में भारतीय युवा प्रतिभाओं के लिए चीन के द्वार खुल जाते हैं लेकिन उन्हें चीन के आम लोगों और कारोबारियों की प्रवृत्ति को ध्यान मे रखते हुए आगे बढने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि इन्हीं विंदुओं को ध्यान में रखते हुए उनके संस्थान ने चीन के लोगों की आम प्रवृत्ति से भारतीय कारोबारियों और युवा कार्यपालकों को अवगत कराने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम आयोजित किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति वी.पी. दत्ता ने कहा कि चीनी बाजार में तेजी का रूख बना हुआ है और वहां की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ रही है उसे कोई रोक नहीं सकता। वहां निजी स्तर पर लोग उत्साहित हैं साथ ही सरकार भी लोगों की मदद कर रही है। चीन और भारत को व्यापारिक स्तर पर एक दूसरे की मदद मिल रही है लेकिन जापान जैसे देशों का भारत पर बहुत भरोसा नहीं है। बल्कि यह कहें कि पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान का रूख भी भारत के प्रति बहुत सकारात्मक नहीं है। चीन की स्थिति दूसरी है, उसकी 40 प्रतिशत जरूरत विदेशों से ही पूरी होती है इसलिए भारत पर उसकी निर्भरता स्वाभाविक है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मधु भल्ला का कहना था कि 1978 और आज के चीन की अर्थव्यवस्था में जमीन आसमान का अंतर है। भारतीय कम्पनियों का चीन के प्रति मोह बढ रहा है इसलिए कई भारतीय कम्पनियों ने वहां अपने प्रतिनिधि कार्यालय भी खोले हैं। चीनी बाजार में भारतीय व्यापारियों के लिए बहुत सम्भावनाएं हैं लेकिन वहां के बाजार को समझना है कि उन्हें भारतीय व्यापारियों से किस स्तर पर सहयोग लेना है। भारत की कम्पनियों को जरा प्रयास करने की जरूरत है वहां तो पार्टनर बैठे हैं।
भारत के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि यहां का नौजवान विपरीत स्थितियों से लड सकता है और विदेशों में सहयोग करने के लिए तैयार बैठा है। भारत को ज्ञान का आधार बनना है और अपनी युवा शक्ति को इसके लिए तैयार रखना है। चीन के साथ व्यापार के लिए नए क्षेत्रों की तलाश करनी होगी। जवाहर लाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी.आर. दीपक ने कहा कि चीन कितना तेजी से आगे बढ रहा है इसका आकलन इसी आंकडे से लगाया जा सकता है कि 1991 में चीन का सकल घरेलू उत्पाद 352 अरब डॉलर था जो 2009

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें